रांची- झारखंड में अजीबोगरीब स्थिति है.राजनीति का रंग और रिवाज कुछ अलग दिख रहा है.प्रवर्तन निदेशालय ने 20 जनवरी को मुख्यमंत्री आवास पहुंचकर राज्य के मुखिया मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पूछताछ की.अजब का दृश्य उस दिन था.सीआरपीएफ दलबल के साथ कांके रोड पहुंच गई. इस पर सत्ता पक्ष के लोगों को कुछ आशंका लगी.बाद में उनके नेता कहने लगे मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने की कोशिश थी.सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस तरह की बातें क्यों की जा रही है.
मुख्यमंत्री ने ऐसा क्या किया है जो कि वह गिरफ्तार हो जाएंगे.सत्ता पक्ष की ओर से तो यह भी कहा गया कि एयरपोर्ट पर एक विशेष विमान तैयार था राजनीतिक विश्लेषक या कानून के जानकार कह रहे हैं कि ऐसा कहीं कुछ नहीं होता कि गिरफ्तार करके बाहर ले जाया जाए.पर सत्ता पक्ष के लोग का यह आरोप चर्चा का विषय बना हुआ है.कानून के दृष्टिकोण से क्या यह संभव है.अब सवाल यह उठ रहा है कि सीआरपीएफ की क्या भूमिका थी.वे लोग बड़ी संख्या में कहां के रोड जहां मुख्यमंत्री का आवास है और जहां ईडी पूछताछ कर रही थी,वहां क्या करने गए थे.इस मूवमेंट पर भी सवाल खड़े किए गए और केस मुकदमा भी हुआ है.राष्ट्रपति शासन लगाने की साजिश का झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आरोप लगाया है.
अब सवाल यह है कि आखिर इस तरह का माहौल क्यों बनाया जा रहा है.भाजपा से जब हमने बात की तो उनका कहना है कि आरंभ से सत्ता पक्ष यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस के लोग सिर्फ बहाने बाजी करते हैं.चोरी और सीनाजोरी की प्रवृत्ति है.इनके खिलाफ इतने मामले हैं कि अगर कानूनी कार्रवाई करना शुरू कर देगा तो फिर कोई जगह नहीं बचेगी.इन लोगों के बचने की और धीरे-धीरे वह दिन आ रहा है इसलिए बौखलाहट में इस तरह की बातें की जा रही है.कानून सबके लिए है.
एक तो मुख्यमंत्री ने सात बार ईडी के संबंध को नजरअंदाज किया.आठवीं बार जब ईडी ने कहा कि वह आ रहे हैं तो उन्हें बुलाया गया और उनसे पूछताछ हुई.सब कुछ ठीक-ठाक रहा केंद्रीय एजेंसी तथ्यों के आधार पर किसी से पूछताछ करती है.यह सबको पता होना चाहिए वह भी खास तौर पर किसी संवैधानिक पद पर बैठे मुख्यमंत्री जैसे व्यक्ति से पूछताछ हवा हवाई नहीं हो सकती क्योंकि एजेंसी को अकाउंटेबल होना होता है.वह संवैधानिक रूप से नियम सम्मत तरीके तहत काम करती है.सत्ता पक्ष यानी झामुमो के लोगों को लगता है कि बचने का रास्ता नहीं है धीरे-धीरे कानून का शिकंजा कसता जा रहा है.इसलिए इस तरह के काम किए जा रहे हैं और बयान दिया जा रहा है.
भाजपा के प्रदेश महामंत्री प्रदीप वर्मा कहते हैं कि जब मुख्यमंत्री से एड की पूछता संपन्न हो गई तो वह अपने आवास से बाहर आकर ललकारने के अंदाज में संबोधन दे रहे थे.यह सीधा सीधी कानून का उल्लंघन है क्योंकि इस क्षेत्र में धारा 144 लगी हुई थी.मुख्यमंत्री को इस पर जवाब देना चाहिए कि आखिर उन्होंने क्यों कानून का उल्लंघन किया प्रदीप वर्मा ने यह भी कहा कि केंद्रीय एजेंसियां तथ्य पर तरीके से काम करती है.किसी के कहने या सुनने पर वह काम नहीं करती.आने वाले समय में कानून अपना काम करेगा.जो कसूरवार हैं जिसने भ्रष्टाचार किया है उसे छोड़ा नहीं जाएगा.यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संकल्प भी है.कोई अगर यह सोचता है कि डराने धमकाने से उसके अपराध छुप जाएंगे या वे बच जाएंगे तो वह गलतफहमी में जी रहा है.
इस मसले पर हमने कुछ कानूनी जानकारों से भी बात की उनका कहना है कि कोई भी केंद्रीय एजेंसी या राज्य की जांच एजेंसी तथ्यों से परे होकर काम नहीं करती,क्योंकि उन्हें कोर्ट में इसका जवाब देना पड़ता है.इसलिए एजेंसी अगर किसी को बुलाती है, कोई जानकारी किसी से लेना चाहती है तो यह उसका फर्ज बनता है कि वह कानून का सहयोग करे.यह अलग बात है कि कितने बार समन जारी किया जा सकता है.यह कानून में कहीं उल्लेखित नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ज्ञानेंद्र मिश्रा का कहना है कि यह केंद्रीय एजेंसी पर निर्भर करता है कि वह किसी आरोपी या किसी ऐसे व्यक्ति से पूछताछ के लिए बुला सकती है.इसके लिए नोटिस जारी कर सकती है या समन जारी किया जा सकता है.इसकी कोई सीमा नहीं है लेकिन जिन्हें भी कोई केंद्रीय एजेंसी बुलाती है तो उन्हें सहयोग जरुर करना चाहिए. लिखनी है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने एक बार फिर पूछताछ के लिए उपलब्ध होने को कहा है.27 जनवरी से लेकर 31 जनवरी के बीच किसी भी दिन पूछताछ हो सकती है.इसकी जानकारी निदेशालय ने मुख्यमंत्री को दी है.बताया जा रहा है कि यह जमीन घोटाला से संबंधित पूछताछ अंतिम होगी. इसके बाद कोई अगला कदम उठाया जाएगा.











