रांची- प्रेम एक पवित्र रिश्ता है.इस रिश्ते में गहराई होती है.इस रिश्ते में विश्वास होता है. दो प्रेम करने वाले लड़के- लड़की युवावस्था में साथ जीने मरने की सोचते हैं.प्रेम जाति और धर्म की दीवार नहीं समझते.यह किया नहीं जाता बल्कि हो जाता है.ऐसा ही कुछ हुआ तमाड़ के प्रह्लाद लोहरा और संगीता कुमारी के साथ दोनों चुप-चुप कर मिलते रहे.इस मिलन ने प्रेम के रंग को गहरा किया जब रंग ही गहरा हो तो फिर इसे छुड़ाना बड़ा मुश्किल होता है लेकिन समाज का अपना चाल, चरित्र और चेहरा होता है.
आज भी जाति और धर्म को लेकर कई तरह की बातें होती रहती हैंं.संगीता और प्रह्लाद का प्यार इसी जाति की बलि बेदी पर चढ़ गया.घर वाले दोनों के रिश्ते से नाखुश थे.स्थिति यहां तक की थी कि लोग दुश्मन बैठे थे.फिर किया था.दोनों यानी प्रह्लाद और संगीता ने कुछ खौफनाक निर्णय ले लिया.समाज ने उन्हें प्यार से साथ जीने का मौका नहीं दिया लेकिन अपने स्तर से प्यार के लिए मरना साथ पसंद किया.मरने से पहले संगीता और प्रह्लाद ने खूब आंसू बहाए.गले से लिपटकर खूब बिलख-बिलख कर रोए.अंत में अपने साथ ले आए जहर एक दूसरे को पिलाया और दुनिया को अलविदा कह दिया.प्रेमी युगल ने यह खौफनाक कदम उठा लिया जिसकी हिमायत नहीं की जा सकती.लेकिन प्यार में ऐसा पहले भी हुआ है.युवावस्था में प्यार का जुनून विवेक के ऊपर एक चादर बिछा जाता है जिससे भविष्य की चिंता ना कर वर्तमान को ही खत्म करने का निर्णय लिया जाता है.प्रेमी युगल की इस घटना से लोगों में चिंता देखी जा रही है.जीवन अनमोल है प्यार करना अपनी जगह है लेकिन लड़के या लड़की को यह भी सोचना चाहिए कि उन दोनों का प्यार कितना भी पद नहीं हो सकता कि घर वालों की सारी खुशियां आग के हवाले कर दी जाए.यह ठीक है कि प्यार किया नहीं जाता है बल्कि हो जाता है.लेकिन इस तरह के कदम उठाना जरा भी उचित नहीं लगता है.मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि युवावस्था में प्यार का हुआ एहसास लोगों को ऐसे खौफनाक कदम उठाने के लिए मजबूर कर देता है.उनका यह भी कहना है कि अगर ऐसे प्यार कहीं परिवार में दिखे तो घर के गार्जियन का यह दायित्व बनता है कि वह अपने बच्चों को सही तरीके से काउंसलिंग करें उन्हें समझाने बुझाने का प्रयास करें.











