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Home अपराध

नक्सलवाद का अंतिम अध्याय पूरा, आ रही है 31 मार्च,2026 वह तारीख

March 25, 2026
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Article :

नक्सलवाद का अंतिम अध्याय: 31 मार्च 2026 तक भारत नक्सल-मुक्त, अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति की जीत

नक्सल मुक्त भारत – मोदी-शाह की अमर देन

(डॉ प्रदीप कुमार वर्मा) 31 मार्च 2026 को भारत का वो काला अध्याय खत्म होने जा रहा है, जिसने पिछले पांच दशकों से देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों को खून से रंगा रखा था।

लाल गलियारे (Red Corridor) का वो जाल, जो छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कुछ अन्य राज्यों के जंगलों में फैला हुआ था, अब टूटने के कगार पर है। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फरवरी 2025 में ही साफ़ तारीख दे दी थी। 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद का खात्मा कर दिया जायेगा। और अब, मार्च 2026 के अंतिम सप्ताह में, आंकड़े और घटनाएं बता रही हैं कि वो लक्ष्य हासिल होने वाला है।

सन 2000 में लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म (LWE) प्रभावित जिलों की संख्या 200 थी। सन 2014 में यह संख्या 126 थी। 2025 तक यह घटकर 38 रह गई। आज सिर्फ़ सात जिले बचे हैं – छत्तीसगढ़ के पांच, झारखंड और ओडिशा में एक-एक। इनमें भी सिर्फ़ तीन को ‘सबसे अधिक प्रभावित’ माना जा रहा है। हिंसा 70% से ज्यादा घटी है। नागरिक और सुरक्षाबलों के शहीद होने की संख्या न के बराबर रह गई है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2025 में ही 2337 नक्सली सरेंडर कर चुके हैं – 2024 के 881 की तुलना में 165% बढ़ोतरी। 317 नक्सली मारे गए। हजारों गिरफ्तार हुए।

ये आंकड़े महज संख्या नहीं, बल्कि एक रणनीति की जीत हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में केंद्र सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ़ बहुआयामी लड़ाई लड़ी। सिर्फ़ गोली नहीं, विकास भी। NDA शासित राज्यों में ‘डबल इंजन’ सरकार ने सड़कें, मोबाइल टावर, स्कूल, अस्पताल और रोजगार दिए। जंगलों में रहने वाले आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ा। नक्सलियों की भर्ती का सबसे बड़ा आधार – बेरोजगारी और पिछड़ापन – खत्म हुआ।

झारखंड इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है। एक समय यह राज्य नक्सलवाद का गढ़ था। 2014-19 में मुख्यमंत्री रघुबर दास के नेतृत्व में, जब केंद्र में भी मोदी सरकार थी, नक्सल समस्या में भारी कमी आई। सड़कों का जाल बिछा, पुलिस स्टेशन मजबूत हुए, स्थानीय युवाओं को नौकरियां मिलीं। आज झारखंड में नक्सली गतिविधियां न के बराबर हैं। डबल इंजन की ताकत यही है – सुरक्षा के साथ विकास।

अमित शाह ने न सिर्फ़ सुरक्षा बलों को खुली छूट दी, बल्कि केंद्र-राज्य तालमेल को भी नया रूप दिया। उन्होंने बार-बार कहा – “नक्सली या तो सरेंडर करो, वरना खत्म होने के लिए तैयार रहो।” और सुरक्षा बलों ने ठीक वैसा ही किया। 2025 की कुछ बड़ी घटनाएं याद कीजिए: मई 2025 में छत्तीसगढ़ के अबुझमाड़ क्षेत्र में ‘ऑपरेशन कागर’ (या ब्लैक फॉरेस्ट) में CPI (माओइस्ट) के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ़ बासवराजू समेत 27 नक्सली ढेर कर दिए गए। यह तीन दशकों का सबसे बड़ा झटका था। इसी वर्ष जनवरी 2026 में झारखंड के वेस्ट सिंहभूम जिले में ‘ऑपरेशन मेगाबुरु’ में 16 नक्सली मारे गए, जिनमें सेंट्रल कमिटी सदस्य आनंद उर्फ़ पटिराम मांझी (एनाल दा) शामिल था। उस पर 2.35 करोड़ का इनाम था।इसी वर्ष पिछले महीने फरवरी 2026 में तेलंगाना में टॉप कमांडर देवजी (थिप्पिरी तिरुपति) ने 20 साथियों के साथ सरेंडर कर दिया। देवजी 40 साल से जंगलों में था। इनके अलावा छत्तीसगढ़ के बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा में दर्जनों छोटे-बड़े एनकाउंटर हुए। स्नाइपर स्पेशलिस्ट, बटालियन कमांडर, महिला कमांडर – सब एक-एक कर खत्म कर दिए गए या सरेंडर करने को मजबूर कर दिए गए। 2025 में अकेले छत्तीसगढ़ में ही 2100 से ज्यादा नक्सलियों ने सरेंडर किया, 1785 नक्सलियों की गिरफ्तारियां हुई और 477 नक्सली ढेर कर दिए गए।

लेकिन सरकार सिर्फ़ नक्सलवाद खत्म करने पर नहीं अटकी। समस्या खत्म होने के बाद इसे दोबारा न उभरने देने का प्लान भी तैयार है। गृह मंत्रालय ने 31 ‘लिगेसी थ्रस्ट डिस्ट्रिक्ट्स’ (Legacy Thrust Territories) चिन्हित किए हैं – जैसे महाराष्ट्र का गढ़चिरौली, मध्य प्रदेश का बालाघाट, तेलंगाना का भद्राद्री कोठागुडेम। ये वो इलाके हैं जहां नक्सलवाद कभी मजबूत था, लेकिन अब हिंसा लगभग खत्म हो चुकी है। इन्हें ‘लिगेसी’ कहा जाता है क्योंकि ये पुराने प्रभाव वाली जगहें हैं, और ‘थ्रस्ट’ इसलिए क्योंकि यहां नक्सल विचारधारा दोबारा पनपने की आशंका बनी रह सकती है। इसलिए केंद्र की मोदी सरकार इन जिलों को सुरक्षा, विकास और सामाजिक योजनाओं में विशेष मदद दे रहा है। झारखंड में भी कई ऐसे जिले हैं, जैसे गुमला, खूंटी, सिमडेगा और चतरा, जहां पहले नक्सल प्रभाव था। इन जिलों में अब केन्द्र की मदद से विशेष विकास की पहल चल रही हैं, जैसे 1947 के बाद पहली बार रेलवे कनेक्टिविटी लाई जा रही है। झारखंड के करीब 32.48% क्षेत्र जंगल है, और गढ़वा, पलामू, लातेहार जैसे जिले पहले संघर्ष से बुरी तरह प्रभावित थे। इन ‘लिगेसी’ इलाकों में अब विकास, सामाजिक योजनाएं और सुरक्षा को साथ-साथ मजबूत किया जा रहा है ताकि कोई भी छाया दोबारा ना आए। क्योंकि, नक्सल विचारधारा अभी पूरी तरह मरी नहीं है, सिर्फ़ हथियार डाल रही है।

नक्सलवाद की जड़ें 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ी हैं। तब यह ‘किसान विद्रोह’ के रूप में शुरू हुआ, लेकिन जल्दी ही हिंसा, आतंक और विकास-विरोधी बन गया। हजारों निर्दोष आदिवासी, जवानों और अधिकारियों की जान गई। स्कूल जलाए गए, सड़कें रोकी गईं, खनिज संपदा लूटने की कोशिशें हुईं। मोदी सरकार ने इसे ‘सबसे बड़ा आंतरिक सुरक्षा चुनौती’ मानकर पूरी ताकत झोंक दी।

आज जब 31 मार्च करीब है, तो पूरा देश गर्व से कह सकता है – लाल गलियारा अब हरा हो रहा है। जहां कभी बंदूक की गूंज थी, वहां अब विकास की आवाज़ है। सड़कें बन रही हैं, बच्चे स्कूल जा रहे हैं, युवा नौकरी पा रहे हैं।

ये सब संभव हुआ है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति से। उन्होंने न सिर्फ़ रणनीति बनाई, बल्कि उसे लागू भी करवाया। सुरक्षा बलों – CRPF, BSF, राज्य पुलिस, DRG – को पूरा समर्थन दिया। सरेंडर पॉलिसी को आकर्षक बनाया। फंडिंग के स्रोत बंद किए। और सबसे बड़ा – राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई।

31 मार्च, 2026 के बाद भारत नक्सल-मुक्त होगा। लेकिन लड़ाई पूरी नहीं होगी। विकास की लड़ाई जारी रहेगी। ताकि नक्सलवाद की कोई भी छाया दोबारा न आए।

(लेखक राज्यसभा के सांसद और झारखंड भारतीय जनता पार्टी के महामंत्री हैं।)

#AntiNaxalOperations #PradipYadav #JharkhandBjp

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