झारखंड के सिमडेगा जिले के एक बेहद साधारण और छोटे से गांव ‘बड़कीछापर’ की रहने वाली सलीमा टेटे आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। हाल ही में नीदरलैंड्स और बेल्जियम में होने वाले एफआईएच महिला हॉकी विश्व कप के लिए उन्हें भारतीय टीम की कमान सौंपी गई है। सलीमा का यह सफर न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है, लेकिन इस मुकाम तक पहुँचने के पीछे उनका एक लंबा और कड़ा संघर्ष रहा है। सलीमा का बचपन बेहद तंगहाली में बीता। जब उन्होंने खेलना शुरू किया, तब उनके पास हॉकी खेलने के लिए बुनियादी साधन भी नहीं थे। वह अपने पिता के साथ गांव के पथरीले मैदानों में हाथ से बनाई गई बांस की स्टिक और एक साधारण सी गेंद से अभ्यास किया करती थीं। सुख-सुविधाओं की भारी कमी के बावजूद उनके पैर कभी नहीं डगमगाए।
गांव और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी शानदार प्रतिभा दिखाने के बाद उन्हें सरकारी खेल केंद्र में ट्रेनिंग का मौका मिला। साल 2016 में उन्होंने पहली बार भारतीय सीनियर टीम में कदम रखा। उनकी काबिलियत को देखते हुए उन्हें 2018 में जूनियर टीम और फिर बाद में सीनियर टीम का कप्तान बनाया गया। वह टोक्यो ओलंपिक सहित कई बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं, जिसके लिए उन्हें साल 2025 में देश के प्रतिष्ठित ‘अर्जुन पुरस्कार’ से भी नवाजा गया। सलीमा की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद भी उनका परिवार आज भी गांव में बेहद सादगी से रहता है। एक समय ऐसा भी था जब उनके घर में बेटी का मैच देखने के लिए टीवी तक नहीं था। उनके पिता सुलक्सन टेटे और भाई आज भी खेती-किसानी करते हैं। परिवार ने बेहद मुश्किल दिनों में हाट-बाजार में छोटी दुकान लगाकर और मजदूरी करके सलीमा के सपनों को जिंदा रखा। सलीमा की इस कहानी से सीख मिलती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी रुकावट आपको आपकी मंजिल तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।














